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	<title>Comments on: Will Free Compulsory Education Possible In A Maoist Conflict Area?</title>
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	<description>The Voice of the Indigenous People of Jharkhand Dishum</description>
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		<title>By: madhubaganiar</title>
		<link>http://jharkhandmirror.org/2010/01/25/will-free-compulsory-education-possible-in-a-maoist-conflict-area/#comment-249</link>
		<dc:creator>madhubaganiar</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jan 2010 08:43:06 +0000</pubDate>
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		<description>धन्यमवाद ज्योति  आपने अत्यंत ही महत्वापूर्ण समस्या  को समाज के सामने रखा है। आदिवासी बच्चों  की सामान्य्,  सरल, खुशमय और भयमुक्त  वातारवण में शिक्षा–हक का सारे आम हरण हो रहा है। यह निहायत ही निंदनीय स्थिति है, जिसके लिए ह्रदयहीन और दिशाहीन प्रशासन जिम्मेदार है। हिंसक नक्सलवादी भी कम जिम्मेदार नहीं है आदिवासी बच्चों को शिक्षा से महरूम करने में। लेकिन प्रशासन इसलिए भी अधिक जिम्मेदार हैं, क्योंकि स्कूलों में बंदूकों और बरूदों के ढेर लगाने के लिए उसने ही संवेदनहीन और दिशाहीन आदेश दे रखा है। सवाल यह है कि पारामिलिटरी को क्यों स्कूलों के दीवारों की सुरक्षा चाहिए ? यदि लम्बे् समय तक वह हिंसक नक्सलवादियों से लोहा लेना चाहती है तो उसके लिए वह सभी तरह के साजोसमान क्यों जुटा कर नहीं रखती है ? पारामिलिटरी को रखने के लिए सरकार क्यों  स्कूलों का ही चयन करती है। ऐसे आदेश आखिर किसकी सहमति से दी जाती है ? अक्सर देखा जाता है कि नक्सलवादियों के नाम पर खाना पूर्ति करने के लिए पारामिलि‍टरी आम आदिवासियों को नक्सली घोषित करके मानवाधिकारों का गंभीर हनन करता हैं। ऐसे में लडके–लडकियों को इन स्कूकलों में भेजना अत्यंत खतरनाक है। रक्षकों का भक्षक बनने की अंतहीन कहानियॉं और इतिहास मौजूद है। अपने गैरकानूनी हिंसक व्यवहार को छुपाने के लिए भी पारामिलिटरी किसी को भी नक्सली घोषित कर सकते हैं। इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी यदि निरापराध मासूम इन स्कूलों में जा कर हिंसा का शिकार होते हैं? सरकार की इस तरह की नासमझी से आम आदिवासी सरकार के खिलाफ और नक्सदलियों के समर्थक बन जाऍं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आदिवासी अंचलों को नक्स्लवादी यदि पिछडे अंचल में बदलने के लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं रख रहे हैं तो ये सरकारी सुरक्षाबल भी नयी पीढी को अनपढ बनाए रखने में अपना सरकारी भूमिका निभा रहे हैं।
 निश्चसय ही संविधान के नाम पर काम करने वाला प्रशासन इस तर‍ह की विकट परिस्थिति के निर्माण के लिए दोषी माना जाएगा। 
http://madhubaganiar.wordpress.com</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>धन्यमवाद ज्योति  आपने अत्यंत ही महत्वापूर्ण समस्या  को समाज के सामने रखा है। आदिवासी बच्चों  की सामान्य्,  सरल, खुशमय और भयमुक्त  वातारवण में शिक्षा–हक का सारे आम हरण हो रहा है। यह निहायत ही निंदनीय स्थिति है, जिसके लिए ह्रदयहीन और दिशाहीन प्रशासन जिम्मेदार है। हिंसक नक्सलवादी भी कम जिम्मेदार नहीं है आदिवासी बच्चों को शिक्षा से महरूम करने में। लेकिन प्रशासन इसलिए भी अधिक जिम्मेदार हैं, क्योंकि स्कूलों में बंदूकों और बरूदों के ढेर लगाने के लिए उसने ही संवेदनहीन और दिशाहीन आदेश दे रखा है। सवाल यह है कि पारामिलिटरी को क्यों स्कूलों के दीवारों की सुरक्षा चाहिए ? यदि लम्बे् समय तक वह हिंसक नक्सलवादियों से लोहा लेना चाहती है तो उसके लिए वह सभी तरह के साजोसमान क्यों जुटा कर नहीं रखती है ? पारामिलिटरी को रखने के लिए सरकार क्यों  स्कूलों का ही चयन करती है। ऐसे आदेश आखिर किसकी सहमति से दी जाती है ? अक्सर देखा जाता है कि नक्सलवादियों के नाम पर खाना पूर्ति करने के लिए पारामिलि‍टरी आम आदिवासियों को नक्सली घोषित करके मानवाधिकारों का गंभीर हनन करता हैं। ऐसे में लडके–लडकियों को इन स्कूकलों में भेजना अत्यंत खतरनाक है। रक्षकों का भक्षक बनने की अंतहीन कहानियॉं और इतिहास मौजूद है। अपने गैरकानूनी हिंसक व्यवहार को छुपाने के लिए भी पारामिलिटरी किसी को भी नक्सली घोषित कर सकते हैं। इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी यदि निरापराध मासूम इन स्कूलों में जा कर हिंसा का शिकार होते हैं? सरकार की इस तरह की नासमझी से आम आदिवासी सरकार के खिलाफ और नक्सदलियों के समर्थक बन जाऍं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आदिवासी अंचलों को नक्स्लवादी यदि पिछडे अंचल में बदलने के लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं रख रहे हैं तो ये सरकारी सुरक्षाबल भी नयी पीढी को अनपढ बनाए रखने में अपना सरकारी भूमिका निभा रहे हैं।<br />
 निश्चसय ही संविधान के नाम पर काम करने वाला प्रशासन इस तर‍ह की विकट परिस्थिति के निर्माण के लिए दोषी माना जाएगा।<br />
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